September 25, 2026
Screenshot 2026-09-25 165330

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने स्पष्ट किया है कि यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस (यूपीआई) के चुनिंदा लेनदेन पर प्रस्तावित मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) उपभोक्ताओं पर नहीं डाला जाएगा और न ही यह सरकार के लिए किसी तरह का कर या उपकर है। प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया (पीटीआई) से बात करते हुए उन्होंने विपक्ष के आरोपों को खारिज किया और कहा कि विवाद खड़ा करने वाले लोग इस तंत्र की बुनियादी व्यवस्था को ठीक से समझे बिना बयानबाजी कर रहे हैं। उन्होंने साफ किया कि यह शुल्क पूरी तरह से एक व्यावसायिक व्यवस्था है, जिसका उद्देश्य भुगतान प्रणाली के साझेदारों—जैसे नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (एनपीसीआई), बैंकों, प्वाइंट-ऑफ-सेल (पीओएस) सेवा प्रदाताओं और मर्चेंट अधिग्रहणकर्ताओं के परिचालन लागत को संतुलित करना है, न कि सरकारी खजाने में कोई राजस्व जमा करना। नए ढांचे के अनुसार, ₹2,000 से अधिक के चुनिंदा व्यक्ति-से-व्यापारी (पी2एम) यूपीआई लेनदेन पर 0.4 प्रतिशत एमडीआर लागू होगा, जिसकी अधिकतम सीमा ₹75,000 या उससे अधिक के भुगतानों के लिए ₹300 तय की गई है। वित्त मंत्री ने डेबिट और क्रेडिट कार्ड का उदाहरण देते हुए कहा कि जिस तरह व्यापारी कार्ड भुगतानों पर लगने वाले एमडीआर को खुद वहन करते हैं और ग्राहकों के अंतिम बिल में अतिरिक्त शुल्क नहीं जोड़ते, ठीक वही व्यवस्था यूपीआई लेनदेन पर भी लागू होगी। इस निर्णय से आम नागरिकों को बड़ी राहत मिलेगी क्योंकि व्यक्ति-से-व्यक्ति (पी2पी) हस्तांतरण और ₹2,000 तक के छोटे व्यापारी लेनदेन पूरी तरह से शुल्क-मुक्त रहेंगे, जिससे देश के कुल मर्चेंट यूपीआई लेनदेन का लगभग 96 प्रतिशत हिस्सा इस शुल्क व्यवस्था से पूरी तरह बाहर और अप्रभावित रहेगा। इसके अलावा, आवश्यक सेवाओं तथा पूंजी बाजार लेनदेन जैसे विशिष्ट क्षेत्रों के लिए विशेष रूप से कम दरें निर्धारित की गई हैं ताकि डिजिटल अर्थव्यवस्था की गति बनी रहे। सीतारमण ने जोर देकर कहा कि डिजिटल भुगतान व्यापारियों को अपना व्यवसाय बढ़ाने में मदद करते हैं, इसलिए एमडीआर का वित्तीय बंटवारा पूरी तरह से व्यापारियों और वित्तीय संस्थानों के बीच का विषय है, जिसमें सरकार की कोई प्रत्यक्ष भूमिका नहीं है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *