संसद के विशेष सत्र को लेकर जारी तरह-तरह की राजनीतिक अटकलों के बीच लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने गुरुवार को स्पष्ट किया कि इस संबंध में फैसला लेने का पूरा अधिकार केवल सरकार के पास है। नई दिल्ली में 26 और 27 अक्टूबर को आयोजित होने वाले ब्रिक्स संसदीय मंच (BRICS Parliamentary Forum) की तैयारियों को लेकर बुलाई गई एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में बोलते हुए बिरला ने कहा कि निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार किसी भी सत्र को बुलाने या स्थगित करने की पहल सरकार की ओर से ही की जाती है। जब उनसे यह पूछा गया कि क्या सरकार लंबित महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित कराने के लिए विशेष सत्र बुला सकती है—क्योंकि 13 अगस्त को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित होने के बाद भी दोनों सदनों का सत्रावसान (Prorogation) नहीं हुआ है—तो उन्होंने स्पष्ट किया कि इस प्रक्रिया में स्पीकर की कोई सीधी भूमिका नहीं होती। उन्होंने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 85 का संदर्भ देते हुए समझाया कि सरकार की संसदीय कार्य समिति इस संबंध में निर्णय लेकर राष्ट्रपति को सिफारिश भेजती है और राष्ट्रपति ही सत्र का आह्वान करते हैं। लोकसभा सचिवालय के सूत्रों के अनुसार, सामान्य स्थापित परंपरा के तहत सरकार किसी विशेष सत्र के आयोजन से कम से कम तीन दिन पहले नोटिस जारी करती है, जबकि शीतकालीन सत्र जैसे नियमित सत्रों के लिए लगभग 15 दिन पूर्व सूचना दी जाती है। चूंकि फिलहाल दोनों में से किसी भी सत्र को लेकर आधिकारिक अधिसूचना जारी नहीं की गई है, इसलिए सत्र के समय को लेकर कयासबाजी का दौर जारी है। संसदीय परंपराओं के तहत जब तक राष्ट्रपति द्वारा दोनों सदनों का सत्रावसान नहीं किया जाता, तब तक तकनीकी रूप से उसी सत्र को अल्प सूचना पर दोबारा बुलाया जा सकता है या नया सत्र अधिसूचित किया जा सकता है। लोकसभा अध्यक्ष के इस बयान से यह पूरी तरह साफ हो गया है कि संसद के आगामी सत्र की तिथियों और रूपरेखा का अंतिम निर्णय केवल केंद्रीय मंत्रिमंडल और सरकार के अधिकार क्षेत्र में ही आता है।
