June 10, 2026
tata motors (3)

टाटा मोटर्स फाउंडेशन ने अपने प्रमुख इंटीग्रेटेड विलेज डेवलपमेंट प्रोग्राम को देशभर के करीब 200 गांवों तक बढ़ा दिया है। यह कार्यक्रम अब 5 राज्यों की 103 ग्राम पंचायतों में चल रहा है और देश के आदिवासी तथा कृषि-प्रधान क्षेत्रों में सामुदायिक भागीदारी के जरिए ग्रामीण विकास को गति दे रहा है। वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान इस कार्यक्रम से 1.15 लाख से अधिक लोगों को लाभ मिला। साथ ही, करीब 20 करोड़ रुपये मूल्य की 50 सरकारी कल्याणकारी योजनाओं के साथ तालमेल बनाकर जमीनी स्तर पर प्रशासनिक व्यवस्था और संस्थागत ढांचे को मजबूत किया गया। यह कार्यक्रम 2018 में महाराष्ट्र के पालघर जिले के आदिवासी क्षेत्र जव्हार की एक ग्राम पंचायत से पायलट प्रोजेक्ट के रूप में शुरू हुआ था। समय के साथ यह ग्रामीण विकास और आत्मनिर्भरता के राष्ट्रीय मॉडल के रूप में उभरा है। आईवीडीपी का उद्देश्य केवल बुनियादी ढांचा तैयार करना नहीं, बल्कि गांवों को इस स्तर तक सशक्त बनाना है कि वे सरकारी योजनाओं और सार्वजनिक संसाधनों का प्रभावी ढंग से लाभ उठा सकें। कार्यक्रम स्थानीय संस्थाओं को मजबूत करने, दस्तावेजी प्रक्रियाओं की कमियों को दूर करने और गांवों की प्रशासनिक क्षमता बढ़ाने पर ध्यान देता है, ताकि विकास की प्रक्रिया लंबे समय तक जारी रह सके।

महाराष्ट्र के पालघर जिले में इस मॉडल के सकारात्मक नतीजे देखने को मिले हैं। कार्यक्रम से जुड़े गांवों में मौसमी पलायन 80% से घटकर 25% रह गया है। किसानों की आय में 55% तक बढ़ोतरी हुई है, जबकि बच्चों में कुपोषण के मामलों में 95% की कमी दर्ज की गई है। इन नतीजों से उत्साहित होकर टाटा मोटर्स फाउंडेशन ने महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और कर्नाटक जैसे राज्यों के आकांक्षी और पिछड़े जिलों तक कार्यक्रम का विस्तार किया है।

आईवीडीपी 2.0 के तहत महाराष्ट्र सरकार के सहयोग से अब 82 ग्राम पंचायतों में तकनीक-आधारित मॉडल पर काम किया जा रहा है। इसका उद्देश्य कार्यक्रम को केवल लागू करने तक सीमित रखने के बजाय एक नीतिगत और दीर्घकालिक बदलाव लाने वाले मॉडल के रूप में विकसित करना है। टाटा मोटर्स फाउंडेशन के सीईओ विनोद कुलकर्णी ने कहा, “करीब 200 गांवों तक पहुंच चुका यह कार्यक्रम सरकारी योजनाओं, पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप और सामुदायिक भागीदारी की ताकत को दिखाता है। हमारा मानना है कि टिकाऊ ग्रामीण विकास तभी संभव है, जब समुदाय खुद उसकी जिम्मेदारी संभाले और व्यवस्थाएं मजबूत हों। कार्यक्रम का सात-स्तरीय ढांचा, समस्याओं की पहचान, न्यूनतम हस्तक्षेप, भरोसा निर्माण, सामुदायिक स्वामित्व, कॉरपोरेट की भूमिका को फंडर नहीं बल्कि संरचनात्मक सहयोगी के रूप में स्थापित करना, शुरुआत से ही आत्मनिर्भरता की योजना बनाना और पूरे इकोसिस्टम को जोड़ना, भारत की संस्थागत जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। आगे भी हमारा फोकस ऐसा ग्रामीण विकास मॉडल तैयार करने पर रहेगा, जिसे बड़े स्तर पर लागू किया जा सके और जो सरकारी नीतियों और कल्याणकारी योजनाओं से जुड़ा हो।”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *