पूर्वी सिंहभूम के कस्बे व गांवों में प्रतिदिन सुबह सूरज की किरणें पूरी तरह से फैलने से पहले ही मंदिरों की घंटियां गूंजने लगती हैं. श्रद्धालु पूजा-अर्चना के लिए एकत्र होते हैं व अपनी आस्था, कृतज्ञता व उम्मीदों के प्रतीक के रूप में फूल चढ़ाते हैं, लेकिन दोपहर होते-होते वही फूल मंदिरों से हटाकर फेंक दिए जाते हैं. वर्षों से मंदिरों में पूजा के बाद बचने वाले मुरझाए गेंदे के फूलों को कचरा समझकर फेंक दिया जाता था. किसी ने नहीं सोचा था कि यही फूल एक दिन कई महिलाओं के जीवन में नई उम्मीद और नई पहचान लेकर आएंगे। जिले की कुछ महिलाएं इन फेंके गए फूलों में अवसर देखा. उन्होंने इन्हें बेकार नहीं, बल्कि बदलाव का साधन बनाया. इन महिलाओं में खुशबू भी हैं. वह अक्सर सोचती थीं कि क्या वे भी परिवार की आमदनी में कुछ सहयोग कर पाएंगी. उनक कहना है कभी नहीं सोचा था कि मंदिरों में चढ़ाए गए फूल हमारी आजीविका का साधन बन सकते हैं। आज इस काम के माध्यम से मैं परिवार के खर्चों में सहयोग कर पा रही हैं और अपने पैरों पर खड़ी हो रही है. आज खुशबू स्वयं सहायता समूह (एसएचजी) की सचिव हैं. उनका समूह उन कई स्वयं सहायता समूहों में से एक है, जिन्हें टाटा स्टील फाउंडेशन का सहयोग और मार्गदर्शन प्राप्त है।
इस पहल से वर्तमान में 30 महिलाएं जुड़ी हुई हैं। जो फूल कभी मंदिरों से निकलकर कचरे में चले जाते थे, आज वही महिलाओं के लिए आय, सम्मान व आत्मनिर्भरता का माध्यम बन गए हैं. ये फूल राम मंदिर (सोनारी), मौनी बाबा मंदिर (सोनारी), मनोकामना मंदिर (साकची), टिनप्लेट काली मंदिर, बेलडीह कालीबाड़ी मंदिर, रंकिनी मंदिर (जादूगोड़ा), हरिना मंदिर (पोटका) और वैष्णो देवी मंदिर (गालूडीह) सहित कई मंदिरों से एकत्र किए जाते हैं। संग्रह के बाद फूलों को छांटा जाता है, सुखाया जाता है और प्रसंस्करण की प्रक्रिया से गुजारा जाता है. इसके बाद इन्हें आकर्षक फ्लावर धूप कोन जैसे उत्पादों में परिवर्तित किया जाता है, जो बाजार में बिक्री के लिए तैयार होते हैं। लेकिन असली बदलाव फूलों में नहीं, बल्कि इन महिलाओं के जीवन में आया है जिनमें से कई महिलाओं के लिए यह पहला अवसर है जब उन्होंने उद्यमिता की दुनिया में कदम रखा है. आज वे उत्पादन की योजना बनाती हैं, कच्चे माल व तैयार उत्पादों का हिसाब रखती हैं, गुणवत्ता सुनिश्चित करती हैं और बाजार से भी जुड़ती हैं. इन्हीं महिलाओं में पिंकी भी शामिल हैं, जो समूह में कैशियर की जिम्मेदारी निभाने के साथ-साथ वित्तीय रिकॉर्ड और उत्पादन कार्यों का भी प्रबंधन करती हैं।
उनका कहना है कि उन्हेंखुशी होती है कि वह अपने परिवार की आर्थिक मदद कर पा रही हैं और साथ ही ऐसे काम का हिस्सा हैं जो पर्यावरण की भी रक्षा करता है। उन्होंने कहा कि अन्य महिलाओं के साथ मिलकर काम करने से उन्हें आत्मनिर्भरता, आत्मविश्वास और बेहतर भविष्य की उम्मीद मिली है। पहले हमारी सुबहें केवल घर के कामकाज तक सीमित रहती थीं, लेकिन अब हर दिन नई ऊर्जा, उत्साह और जिम्मेदारी के साथ शुरू होता है. अब तक 5.5 टन से अधिक मंदिरों के बेकार फूलों को रीसायकल किया जा चुका है, जिससे 61,000 रुपये से अधिक के उत्पादों की बिक्री हुई है, लेकिन इस पहल की असली सफलता केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं है. इस पहल का वास्तविक प्रभाव महिलाओं के बढ़ते आत्मविश्वास में दिखाई देता।
