June 18, 2026
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सीएसआईआर-एनएमएल ने बेंगलुरू स्थित मेसर्स कंपनी सर्कुओर प्राइवेट लिमिटेड के साथ खराब हो चुकी लिथियम-आयन बैटरियों की रिसाइक्लिंग तकनीक के हस्तांतरण को लेकर महत्वपूर्ण करार किया है. इस तकनीक की मदद से अनुपयोगी बैटरियों से लिथियम, कोबाल्ट, मैंगनीज, निकिल, तांबा, ऐलुमिनियम और ग्रेफाइट जैसे मूल्यवान पदार्थों की वैज्ञानिक तरीके से पुनर्प्राप्ति की जा सकेगी।

एनएमएल की ओर से विकसित यह तकनीक बैटरी कचरे के सुरक्षित प्रबंधन, महत्वपूर्ण धातुओं की घरेलू उपलब्धता बढ़ाने तथा परिपत्र अर्थव्यवस्था (सर्कुलर इकोनॉमी) को मजबूत करने में सहायक होगी. कंपनी के निदेशक श्रीकुमार वाचस्पति ने कहा कि बढ़ते इलेक्ट्रिक वाहन और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के उपयोग के कारण लिथियम-आयन बैटरियों का कचरा तेजी से बढ़ रहा है। ऐसे में पुरानी बैटरियां भविष्य के लिए महत्वपूर्ण द्वितीयक संसाधन साबित हो सकती हैं. सीएसआईआर-एनएमएल के निदेशक डा. संदीप घोष चौधरी की मौजूदगी में हुए इस करार के दौरान मुख्य वैज्ञानिक व परियोजना प्रमुख डा. मनीष कुमार झा, धातु निष्कर्षण विभाग के प्रमुख डा. संजय कुमार, सीओए जय शंकर शरण व डा. अंकुर शर्मा मौजूद थे। तकनीक हस्तांतरण प्रक्रिया को पूरा कराने में डा. एस के पाल व डा. बीना कुमारी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी।

आयात निर्भरता घटाने में मिलेगी मदद

विशेषज्ञों के अनुसार भारत वर्तमान में लिथियम, कोबाल्ट, निकिल व ग्रेफाइट जैसी कई महत्वपूर्ण सामग्रियों के लिए आयात पर निर्भर है. बैटरी रिसाइक्लिंग के माध्यम से इन धातुओं की पुनर्प्राप्ति होने पर देश की आयात निर्भरता कम होगी और इलेक्ट्रिक वाहन व ऊर्जा भंडारण क्षेत्र को आवश्यक कच्चा माल घरेलू स्तर पर उपलब्ध हो सकेगा।

पर्यावरण संरक्षण को मिलेगा बढ़ावा

खराब बैटरियों को सामान्य कचरे की तरह फेंकना पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य के लिए खतरनाक हो सकता है. विकसित तकनीक के जरिए इन बैटरियों का सुरक्षित प्रसंस्करण कर मूल्यवान धातुओं को दोबारा उपयोग में लाया जा सकेगा।  इससे नई धातुओं के खनन की आवश्यकता कम होगी, संसाधनों की बचत होगी और कचरे में भी कमी आएगी।

बैटरी रिसाइक्लिंग के क्षेत्र में महत्वपूर्ण पहल

एनएमएल के वैज्ञानिक डा. मनीष कुमार झा व उनकी टीम ने लंबे शोध के बाद यह तकनीक विकसित की है। एनएमएल व मेसर्स सर्कुओर के बीच हुआ यह करार प्रयोगशाला में विकसित तकनीक को उद्योग तक पहुंचाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है जिससे बैटरी कचरे के वैज्ञानिक प्रबंधन, संसाधन सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण तथा आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को मजबूती मिलने की उम्मीद है।

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