भारतीय रुपया २१ जनवरी २०२६ को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले गिरकर ९१.३३ के अपने नए ऐतिहासिक निचले स्तर पर पहुँच गया है। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक अनिश्चितताओं और भू-राजनीतिक तनावों के बीच विदेशी निवेशकों द्वारा भारतीय शेयर बाजार से लगातार पूंजी निकालने के कारण रुपये पर दबाव बढ़ा है। इस महीने विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने अब तक भारतीय इक्विटी से लगभग २.७ अरब डॉलर की निकासी की है। इसके अलावा, अमेरिका के साथ व्यापार समझौते में हो रही देरी और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ते ‘रिस्क-अवर्जन’ (जोखिम से बचाव) के माहौल ने भारतीय मुद्रा की स्थिति को और कमजोर कर दिया है।
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि रुपये में यह गिरावट न केवल वैश्विक कारणों से है, बल्कि घरेलू कारकों जैसे सुस्त आर्थिक आय और उच्च मूल्यांकन से भी प्रेरित है। दक्षिण कोरियाई वोन और इंडोनेशियाई रुपिया जैसी अन्य एशियाई मुद्राओं में भी गिरावट देखी गई है, लेकिन रुपया अपने प्रतिस्पर्धियों की तुलना में अधिक कमजोर साबित हुआ है। हालांकि भारतीय रिजर्व बैंक ने अतीत में डॉलर बेचकर रुपये को संभालने की कोशिश की है, लेकिन वर्तमान स्थितियों को देखते हुए बाजार में घबराहट का माहौल बना हुआ है। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि पूंजी की निकासी इसी तरह जारी रहती है और वैश्विक व्यापारिक चुनौतियां कम नहीं होतीं, तो आने वाले समय में रुपये पर दबाव और बढ़ सकता है।
