सेबी ने सहारा इंडिया कमर्शियल कॉरपोरेशन लिमिटेड यानी एसआईसीसीएल मामले में प्रतिभूति अपीलीय न्यायाधिकरण यानी सैट के उस आदेश को आंशिक रूप से उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी है, जिसमें कंपनी के चार प्रबंधकों और कंपनी सचिव को राहत दी गई थी। भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड यानी सेबी की इस याचिका पर प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति बी मोहना की अवकाशकालीन पीठ अट्ठारह जून को सुनवाई करेगी। इससे पहले न्यायाधिकरण ने नौ मार्च को अपने आदेश में कहा था कि वर्ष उन्नीस सौ निन्यानवे से वर्ष दो हजार आठ के बीच एसआईसीसीएल द्वारा जारी वैकल्पिक पूर्ण परिवर्तनीय डिबेंचर यानी ओएफसीडी सार्वजनिक निर्गम के दायरे में आते हैं, लिहाजा वे सेबी के नियामकीय अधिकार क्षेत्र में आते हैं। सैट ने कहा था कि कंपनी ने इस अवधि में करीब एक करोड़ अट्ठानवे लाख निवेशकों से लगभग चौदह हजार एक सौ छह करोड़ रुपये जुटाए, जिसे निजी नियोजन नहीं माना जा सकता है।
न्यायाधिकरण ने कंपनी एवं उसके निदेशकों की तरफ से दायर अपीलों को तो खारिज कर दिया था, लेकिन कंपनी के चार प्रबंधकों और सचिव की अलग से दायर अपील स्वीकार करते हुए उन्हें राहत दे दी थी। सैट ने अपने फैसले में कहा था कि केवल कर्मचारी होने के नाते उन्हें कंपनी के शीर्ष फैसलों के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है। अब बाजार नियामक सेबी ने सैट के आदेश के इसी हिस्से को शीर्ष अदालत में चुनौती दी है। यह पूरा मामला सेबी के अक्टूबर दो हजार अठारह के उस आदेश से जुड़ा है, जिसमें सहारा की इस कंपनी को निवेशकों का पैसा लौटाने, अपनी परिसंपत्तियों का विवरण देने और कुछ अधिकारियों को प्रतिभूति बाजार से प्रतिबंधित करने का निर्देश दिया गया था। नियामक का मानना है कि प्रबंधन से जुड़े अधिकारियों को जवाबदेही से पूरी तरह मुक्त नहीं किया जा सकता है।
