बिहार में अपराध की कमर तोड़ने के लिए बिहार एसटीएफ के आर्म्स सेल ने एक अभियान छेड़ा है। एसटीएफ ने पूरे राज्य में सक्रिय 250 बड़े आर्म्स सप्लायर और तस्करों की एक सूची तैयार की है, जिसमें अकेले तिरहुत प्रक्षेत्र के 10 कुख्यात हथियार तस्कर शामिल हैं। इस मुहिम का उद्देश्य बिहार में पैर पसार चुके अवैध हथियार तस्करी के नेटवर्क को पूरी तरह ध्वस्त करना है। बिहार एसटीएफ के डीआईजी संजय कुमार के नेतृत्व में चलाए जा रहे इस अभियान में उन मजदूरों पर विशेष नजर रखी जा रही है जो अवैध मिनी गन फैक्ट्रियों में हथियार बनाने का काम करते हैं। एसटीएफ का मानना है कि राज्य में होने वाले 90 फीसदी अपराधों में स्थानीय स्तर पर बनी ‘देसी पिस्टल’ का इस्तेमाल होता है। जांच में यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है कि अपराधी पिस्टल तो स्थानीय स्तर पर निर्मित इस्तेमाल करते हैं, लेकिन उनके कारतूस कोलकाता, उत्तर प्रदेश, ओडिशा और झारखंड जैसे पड़ोसी राज्यों से तस्करी कर मंगाए जाते हैं। इस नेटवर्क को खंगालने के लिए एसटीएफ की टीमें अब इन राज्यों में भी अपना जाल फैला रही हैं ताकि कारतूसों की आपूर्ति बाधित की जा सके। एक तरफ एसटीएफ तस्करों को सलाखों के पीछे भेज रही है, तो दूसरी तरफ पुलिसिया कार्यशैली की चूक से उन्हें राहत भी मिल रही है। मुजफ्फरपुर के पारू थाना क्षेत्र के मगुरहिया गांव में 9 जनवरी को पकड़ी गई मिनी गन फैक्ट्री का मामला इसका बड़ा उदाहरण है। बीते 22 अप्रैल को इस मामले के दो मुख्य आरोपितों- उज्जवल कुमार और प्रदीप कुमार शर्मा को जमानत मिल गई।अदालत में उज्जवल की जमानत पर सुनवाई के दौरान यह बात सामने आई कि पुलिस ने समय पर केस डायरी और साक्ष्य पेश नहीं किए। वहीं, प्रदीप कुमार की जमानत के दौरान हाईकोर्ट में जब्ती सूची बनाने में नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 105 के प्रावधानों का पालन न करने पर सवाल उठाए गए।
एसटीएफ मुख्यालय ने स्पष्ट किया है कि सूची में शामिल सभी सप्लायरों की वर्तमान गतिविधियों, मोबाइल लोकेशन और उनके संपर्कों की गहन जांच की जा रही है। हर जिले में पुलिस उन लोगों की कुंडली खंगाल रही है जो पहले कभी हथियार निर्माण या गन फैक्ट्री के संचालन से जुड़े रहे हैं। पुलिस की यह मुहिम न केवल तस्करों को पकड़ने की है, बल्कि अवैध हथियारों की मांग और आपूर्ति के पूरे तंत्र को जड़ से खत्म करने की है।
