झारखंड में संभवतः पहली बार हुए चिकित्सा उपलब्धि के तहत, भगवान महावीर मणिपाल हॉस्पिटल्स के सीनियर कंसल्टेंट – जनरल एवं मिनिमली इनवेसिव सर्जरी, डॉ. गौतम चंद्रा ने फूड पाइप (इसोफेगस) फटने के दो दुर्लभ और जानलेवा मामलों का सफल इलाज किया। इस स्थिति को मेडिकल भाषा में बोएरहावे सिंड्रोम (Boerhaave Syndrome) कहा जाता है, जो बहुत ही दुर्लभ सर्जिकल इमरजेंसी मानी जाती है। यह आमतौर पर तेज उल्टी के कारण होता है और यदि 24 घंटे के भीतर इलाज न मिले तो जान का खतरा बढ़ सकता है। कम समय में ऐसे दो मामलों का सफल इलाज अस्पताल की उन्नत चिकित्सा क्षमता को दर्शाता है और झारखंड के लिए एक बड़ी उपलब्धि है। फरवरी महीने में हॉस्पिटल्स में रांची और रामगढ़ से दो पुरुष मरीज पहुंचे। इनमें से एक 29 वर्षीय छात्र अश्विनी था, जिसे आयुर्वेदिक क्लेंज़िंग प्रक्रिया के दौरान जबरन उल्टी कराने के बाद समस्या हुई। वहीं दूसरा मरीज 43 वर्ष के आसपास का कॉर्पोरेट प्रोफेशनल था, जिसे अत्यधिक शराब सेवन के बाद तेज उल्टी हुई। दोनों मरीजों में सीने में दर्द, पेट दर्द और बेचैनी जैसे लक्षण थे, जो अक्सर अन्य बीमारियों जैसे लगते हैं, जिससे पहचान करना मुश्किल हो जाता है।
डॉ. गौतम चंद्रा की समय पर की गई जांच से सही बीमारी का संदेह हुआ, जिसके बाद अल्ट्रासाउंड में असामान्य एयर पॉकेट्स दिखाई दिए और सीटी स्कैन से निचले फूड पाइप के पूरी तरह फटने की पुष्टि हुई। डॉ. गौतम चंद्रा, सीनियर कंसल्टेंट – जनरल एवं मिनिमली इनवेसिव सर्जरी, भगवान महावीर मणिपाल हॉस्पिटल्स, रांची ने कहा, “यह सर्जरी बहुत ही दुर्लभ सर्जिकल इमरजेंसी है, जो किसी सर्जन को अपने करियर में शायद एक ही बार देखने को मिलती है। यदि इलाज में देरी हो जाए तो मृत्यु दर 40% तक हो सकती है। एक ही महीने में ऐसे दो मामलों का सफल इलाज करना बहुत ही असामान्य है। समय पर जांच, तुरंत सर्जरी और बेहतर ICU देखभाल की मदद से हम दोनों मरीजों का सफल इलाज कर पाए।”
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए तुरंत एक आपातकालीन थोराकोएब्डोमिनल सर्जरी की गई, जिसमें छाती और पेट दोनों हिस्सों से एक साथ ऑपरेशन कर फटे हिस्से को ठीक किया गया। पहला मरीज ‘गोल्डन आवर’ के भीतर अस्पताल पहुंच गया था, जिससे उसका इलाज समय पर हो सका और रिकवरी भी बेहतर रही। दूसरा मरीज 48 घंटे बाद अस्पताल पहुंचा, जिससे जोखिम काफी बढ़ गया था। परामर्श के बाद उसकी सर्जरी की गई। ऑपरेशन के बाद उसे आईसीयू में रखा गया और उसे निमोनिया तथा फेफड़ों में संक्रमण हो गया, जिसके लिए 5–7 दिनों तक गहन एंटीबायोटिक और सहायक उपचार दिया गया। स्थिति स्थिर होने के बाद मरीज धीरे-धीरे ठीक हो गया और बिना किसी बड़ी जटिलता के स्वस्थ हो गया। दोनों मरीज अब पूरी तरह स्वस्थ हैं, अपने रोजमर्रा के काम में वापस लौट चुके हैं।
